निराश थे काफ़ी उस दिन, हमारे बाबाजी, बड़ी उम्मिदो से एक ब्लॉग का निर्माण करके उसपे आने जाने वाले हर व्यक्ति पर निगाह लगाए बैठे थे| अजी ये नित्य नयी टेक्नालजी ले के आ जाते हें यह स्याले, इक नज़र में ही पता पड़ जाता है, कोन्ने देखा किधर से देखा, कितनी देर आँखे सेक के गया नामाकूल| अस्थि-मज्ज़र इक, कोई तो कुछ बोलेगा, कोई तो एकाध टिप्पणी करके प्रयास की सराहना करेगा, अरे माना गूड़ व्यक्ति हे हम, पर भावनाए तो भाई हमारे अंदर भी हें| प्रशंसा के पुल न सही, आपकी तो गालियाँ भी हमे मीठी लगती| कितते आए कितते गए, इक भी स्याला उम्मीद पे खरा ना उतरा, खुदका भी समय नष्ट, बाबाजी का भी(भूल गए थे की ब्लॉग बनाया ही इसीलिए था)|
खैर, हमसे बाबाजी की यह हालत देखी ना गई| हमने भी सिगरेट का सुनहरा, रजत और यहाँ तक की कान्स्य कश भी उन्हे दे डाला| अब भाई साहब हम भी इंसान ही हें|दूसरे का दर्द देखके हम भी दर्द में होने का ढोंग तो रच ही लेते हें|
लेकिन अचरज तो साहब इस बात का था इक पिद्दी से ब्लॉग को लेके इतना दर्द, अरे माना आपका सपना है, इन कलयुगी जानवरो को इंसानियत का पाठ पढ़ना| पर महाशय, जो आपने लिखा था वो भी तो हिन्दी साहित्य की बदनामी के सिवा कुछ नही था| इतनी निराशा तो भगवान राम को सीता हरण के बाद भी नही हुई थी, मन ही मन तो वो भी खुश ही थे, चलो बला टली| अब हमसे और ना देखा गया, हमने भी शर्त रख दी, की भाई अब तो अगली सिगरेट तभी जलेगी जब आप दिल के राज़ खोलोगे|
किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बाबाजी ने पहले हमे देखा, उसके बाद उस गुमटी वाले को| हमे तो लगा की आज बाबाजी की उदासीन शकल से यह गुमटिवाला कहीं इन्हे सिगरेट दे ना दे, पर बाबाजी ने उसके भाव हमसे पहले ही पढ़ लिए और इससे पहले गुमटी वाला पुरानी उधारी माँगता, बाबाजी हमसे बोले ले लो ५ सिगरेट आज ज़रूरत पड़ेगी| हमने खीसे में डला सड़ा हुआ बीस का नोट निकाला, और गर्व से गुमटीवाले से ५ गोल्डफ्लेक के माँग कर दी|
रूम को चौतरफ़ा बंद करके, धुएँ में सारोबोर होने को हम तियार हो गए| बाबाजी भी व्यावहारिक थे, उन्होने तखत के कोने में दबी छ्होटी सी चिलम की पूडिया और निकाल ली| तंबाखू और माल का मिश्रण बनाके हमे पेश किया और इक खुद जला के बैठ गए|
बाबाजी ने अपनी दुखभरी कहानी शुरू की, बोले बाबू तुम जानते नही हो क्या हुआ है हमारे साथ| हमारे जिगर में कौतूहल मच गया, जानने की अपार इक्चा हो गए, नया गॉसिप सुनने की आस में कुत्ते की तरह लार टपकने लगी हमारी, धुआँ भी बहुत भर गया था कमरे में, दिल कुलाचे मारने लगा| बाबाजी ने भी अपना मुह खोला, और अमृत की तलाश में हम ज़हर पीने को भी तैय्यार हो गए|
too gud to read
ReplyDeletei can relate closely with it :)
lol..hilarious!
ReplyDeleteThank you... :)
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